अमेरिकी सेना अपने अधिकारियों को वैश्विक नेतृत्व और रणनीतिक क्षमता विकसित करने के लिए टॉप यूनिवर्सिटीज में दाखिला दिलाती रही है। इस प्रक्रिया को US Senior Service College Fellowship (SSCF) या Professional Military Education (PME) के नाम से जाना जाता है। लेकिन हाल ही में पेंटागन ने 22 प्रतिष्ठित संस्थानों को इस लिस्ट से हटाने का फैसला लिया, जिससे सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर ऐसा कदम क्यों उठाया गया?
SSCF Fellowship Colleges और PME का मूल उद्देश्य आर्मी के वरिष्ठ अधिकारियों को सैन्य संचालन, नई तकनीक एवं नीति-निर्माण की गहरी समझ प्रदान करना है। इनमें हार्वर्ड, MIT और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी जैसे नाम शामिल थे। लेकिन Pentagon Universities Ban के तहत इन संस्थानों पर रोक लगने के चलते अधिकारी अब यह फायदा नहीं उठा पाएंगे।
इस कदम के पीछे मुख्य तर्क सुरक्षा चिंताओं और अकादमिक मानकों का पालन करने पर जोर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ विश्वविद्यालयों के साथ विदेशी साझेदारियों में पारदर्शिता की कमी देखी गई, जबकि अन्य संस्थानों के पाठ्यक्रम सैन्य आवश्यकताओं से मेल नहीं खाते थे। इसलिए US Army bans US universities जैसे बहस शुरू हो गई कि क्या ये कॉलेज आर्मी की सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुकूल हैं या नहीं?
मेरी नजर में ये फैसला आर्मी की आधुनिकरण रणनीति का हिस्सा है। जहां एक ओर टेक्नोलॉजी और साइबर सुरक्षा में तेजी से बदलाव आ रहे हैं, वहीं अधिकारी को ऐसे संस्थानों से सीखना जरूरी है जो इस रफ्तार से तालमेल बैठा सकें। why pentagon removed universities in pme list इसकी वजह यह भी हो सकती है कि कुछ कॉलेजेजीयाँ प्रोग्राम्स में अपेक्षित तकनीकी गहराई और व्यावहारिक ट्रेनिंग नहीं दे पाए।
सारांश में कहा जा सकता है कि अमेरिका कॉलेज स्टूडेंट बैन का लक्ष्य आर्मी के वरिष्ठ नेतृत्व को सशक्त बनाए रखना है, न कि शैक्षिक प्रतिबंध लगाना। इस बदलाव से पेंटागन उन संस्थानों पर फोकस करेगा जो नए सुरक्षा परिदृश्यों के अनुसार तैयार हैं। आने वाले समय में नए अकादमिक पार्टनरशिप और उन्नत पाठ्यक्रम इस खाली जगह को भरेंगे, ताकि अमेरिकी सेना की रणनीति में निरंतरता बनी रहे।

