दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शुक्रवार को फिर सुर्ख़ियाँ बटोरते हुए छात्रसंघ ने jnusu long march का ऐलान किया. कैंपस से Ministry of Education तक पैदल कूच करते समय हल्का-फुल्का आंदोलन अचानक पुलिस के साथ झड़प में बदल गया. सुरक्षाबलों ने माहौल नियंत्रित करने के लिए जवाबी कार्रवाई की, जिसमें 50 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया.
विवाद का केंद्र बाख़ूबी अपडेट किए जा रहे jnu vc suspension के फैसले के खिलाफ कनवोई निकालना था. aditi jnusu president ने इस मार्च को एकता और निष्पक्षता का संदेश देने वाला बताया था, लेकिन प्रशासन ने अनुमति न देने की बात कहकर चाल में पाबंदी लगाने की कोशिश की. साथ ही, danish jnusu और अन्य बर्खास्त छात्रों की बहाली जैसे मुद्दे भी मंच पर उभर आए.
जैसे ही मार्च कैंपस से बाहर निकला, छात्रों ने जोरदार ambedkar chants के साथ अपने गुस्से को मुखर किया. कुछ छात्र ‘न्याय चाहिए’ के नारे लगा रहे थे, तो पुलिस ने लाइन लगाकर रोकने की कोशिश की. इस दौरान पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और delhi police detains jnu students करने की कार्रवाई तेज कर दी, जिससे प्रदर्शन और अधिक गरमा गया.
पिछले कुछ महीनों से चल रहे student rustication jnu के मामले ने छात्रों में असंतोष बढ़ाया है. यह संघर्ष सिर्फ एक प्रार्थना पत्र नहीं, बल्कि छात्रों की स्वर उठाने की भावना को उजागर कर रहा है. इस jnu protest की मौजूदा लीक या शांति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परिसर में लोकतांत्रिक अधिकारों और संवाद के प्रचार-प्रसार का भी पैमाना बनता जा रहा है.
निष्कर्षतः, जेएनयू का यह ताज़ा बवाल हमें याद दिलाता है कि विश्वविद्यालय केवल शिक्षा ग्रहण करने की जगह नहीं, बल्कि विचारों की मंथनशाला है. प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद ही इस टकराव को शांत करने का सबसे कारगर रास्ता होगा. ऐसे में हर पक्ष को सह-रचनात्मक तरीकों से समाधान तलाशना चाहिए, ताकि भविष्य में शिक्षा और अध्ययन का माहौल सुर्ख़ियों के बजाए उपलब्धियों के लिए चर्चित हो.

