शिक्षा को अक्सर उम्र की दीवार से टकराया जाता है, लेकिन तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के वेलंकन्नी निवासी सुरेश कुमार ने साबित कर दिया कि लगन और जुनून उम्र की सीमा को ध्वस्त कर सकते हैं। 1992 में 12वीं पास करने के बाद उनका मेडिकल की पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया, लेकिन इसी बीच उन्होंने फार्माकोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएशन, MBA और दो PhD कर अपने शैक्षणिक सफर को समृद्ध किया। अब 51 वर्ष की उम्र में MBBS की दिशा में कदम रखते हुए उन्होंने नए सिरे से अपनी कहानी लिखी है।
2022 में जब पहली बार NEET में सफलता न मिली, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी। अंग्रेजी की किताबों की जगह उन्होंने बायोलॉजी की कॉपियाँ अपने बेटे को पढ़ाने के बहाने खुद ही रिवाइज कीं और पुराने प्रश्नपत्रों का विश्लेषण किया। फुल-टाइम डायग्नोस्टिक्स इंडस्ट्री में नौकरी के साथ पढ़ाई करना आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने रात के दस बजे से आधी रात तक किताबों से ताल्लुक रखकर दिखाया कि निरंतरता ही असली चाबी है।
उनकी तैयारी की रणनीति में समय प्रबंधन ने खास भूमिका निभाई। काम के बाद थकान के बावजूद उन्होंने हर दिन एक टॉपिक पर पकड़ बनाने के लिए नियमित रिवीजन और मॉक टेस्ट जारी रखा। PwD कोटे में 720 में से 192 अंक लाकर सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट पाना उनके आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम का निकास था। इस अनुभव ने यह बता दिया कि सही दिशा में किए गए प्रयास हमेशा फल देते हैं।
एक सड़क हादसे ने सुरेश कुमार को जीवन और सीखने की प्रेरणा फिर से दी। दुर्घटना के बाद चलने-फिरने में आई कठिनाई ने उन्हें यह समझ दिलाई कि चिकित्सा क्षेत्र में उतरकर दूसरों की मदद करना ही उनकी असली मंजिल है। पत्नी दुर्गा और परिवार के अटूट समर्थन ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। अब वह अपनी 72 वर्षीय मां के साथ 7 किलोमीटर साइकिल यात्रा करके कॉलेज पहुंचेंगे, यह उनकी निडरता और आत्मनिर्भरता की कहानी बयां करती है।
सुरेश कुमार की इस मिसाल से साफ है कि शिक्षा के पथ पर उम्र केवल एक आंकड़ा भर है। अगर जुनून हो और परिवार का साथ, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। इस प्रेरक कहानी से हमें सीख मिलती है कि जीवन भर सीखने की चाह ही असली सफलता की निशानी है। उनका सफर प्रेरित करता है कि हर उम्र में नई शुरुआत की जा सकती है।

