पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार पर तीखे तेवर अपनाते हुए शिक्षा व्यवस्था में जारी खामियों को उजागर किया। सागर और बड़वानी में उन्होंने स्कूलों के अभावग्रस्त ढांचे और आदिवासी विद्यार्थियों के साथ होने वाले कथित भेदभाव की घटनाओं को सार्वजनिक मंच पर रखा। इस वार्ता ने एक बार फिर राज्य की सीखने की प्रणाली पर उठते सवालों को ताजा कर दिया है।
सागर में छोटे बच्चों को हैंडपंप का सहारा लेना पड़ रहा है और कई स्कूल भवनों की हालत इतनी दयनीय है कि पढ़ाई-लिखाई बुनियादी सुविधाओं की कमी में प्रभावित हो रही है। कक्षा-कक्षों की मरम्मत लटकती रहती है, जबकि शौचालय और पीने के पानी की पुख्ता व्यवस्था न होने से छात्रों और अध्यापकों दोनों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
बड़वानी में आदिवासी समाज के छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव का मामला और भी चिंताजनक है। कमलनाथ ने आरोप लगाया कि इन विद्यार्थियों को बराबर का स्थान नहीं मिल रहा, जिससे उनका मनोबल टूट रहा है। यह स्थिति सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यभर के पीछे पड़े क्षेत्रों में भी समान रूप में देखी जा सकती है।
इन बुनियादी कमियों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि शिक्षा संस्थानों को सुचारू ढंग से चलाने के लिए ठोस योजनाएं बनाना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। स्कूलों के अविकसित इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने, शिक्षकों की संख्या बढ़ाने और समान अवसर सुनिश्चित करने पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए। याद रहे शिक्षा में निवेश ही किसी भी प्रदेश की उन्नति का आधार है।
निष्कर्षतः, कमलनाथ द्वारा उठाए गए ये मुद्दे हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा केवल कागजों पर वादों का विषय नहीं, बल्कि हरेक बच्चे के उज्जवल भविष्य का आधार है। मध्यप्रदेश में अगर शिक्षा को मौलिक दर्जा देना है तो उन कमजोर कड़ियों को मजबूती से जोड़ना होगा, जो आज लाखों छात्रों को सड़क पर बैठने पर मजबूर कर रही हैं।

