कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद् में हाल ही में ‘शब्दों से आत्मा तक की यात्रा’ थीम पर Kavya Lahari-3 का चौथा सत्र आयोजित हुआ। इस उत्सव में देश-विदेश के कवि और गद्यकारों ने भाग लेकर अपनी रचनात्मकता के रंग बिखेरे। मंच पर स्वागत समारोह से लेकर विश्वकवि पंडितों तक, हर वक्त साहित्यिक अनुभूतियों का प्रवाह बना रहा।
कार्यक्रम की शुरुआत परिषद् अध्यक्ष के उद्घाटन भाषण से हुई, जिसमें उन्होंने कविता के समाज-परिवर्तनकारी पहलू पर जोर दिया। उसके बाद युवा और अनुभवी कवियों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें अत्यंत गहन भावनात्मक अभिव्यक्ति और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि झलक रही थी। संगीत-रागिनी के संगम ने भी आयोजन में चार चांद लगाए।
इस चौथी लहर का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था मौलिक रचनाशीलता की बहार। कवि-समूह ने भाषा की सीमाओं को लांघकर आत्मा की गहराइयों में उतरने का निराला प्रयास किया। मेरे विचार से ‘शब्दों से आत्मा तक’ का यह सफर दर्शाता है कि कैसे कविता व्यक्ति का अंतर्मन उजागर करके समाज में एक साझा संवेदना पैदा कर सकती है।
कोलकाता की साहित्यिक पहचान को और पुष्ट करते हुए इस आयोजन ने नई पीढ़ी के रचनाकारों को मंच प्रदान किया। bharatiya bhasha parishad की यह पहल साहित्यिक परंपराओं को निरंतरता देते हुए सांस्कृतिक संवाद को प्रोत्साहित करती है। इस तरह की बैठकों से भाषा के संरक्षण के साथ-साथ नए प्रयोगों को भी बल मिलता है।
संक्षेप में, कवि लहरी-3 की चौथी लहर ने शब्द और आत्मा के बीच का सेतु मजबूती से स्थापित किया। ऐसी कवि संगोष्ठियाँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य केवल पन्नों तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारी सोच, भावना और समाज को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। आने वाले समय में भी ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर को और समृद्ध करेंगे।

