इंदौर नगर निगम में हाल ही में उजागर हुए नामांतरण घोटाले ने नागरिकों के विश्वास को झकझोर दिया। इस घटना ने संपत्ति नामांतरण प्रक्रिया में मौजूद कमियों और आश्वस्तिकरण की कमी को सामने रखा। इन कमियों को दूर करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल के निर्देश पर नई व्यवस्था लागू की गई है।
नई व्यवस्था के तहत अब जो भी आवेदक नामांतरण दाखिला कराएगा, उसे नामांतरण कार्यवाही पूरी होते ही उस संपत्ति का लेजर रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से दिया जाएगा। पहले दस्तावेज़ बदलने के बाद लेजर की जानकारी ऑनलाइन या समय के बाद मिलती थी, लेकिन अब फिजिकल या डिजिटल किन्हीं भी रूप में लेजर की प्रति तुरंत उपलब्ध होगी। इससे नागरिक खुद रिकॉर्ड देख सकेंगे और किसी भी तरह की गलती या छेड़छाड़ पर तुरंत आपत्ति उठा सकेंगे।
नागरिकों के लिए यह बदलाव कई मायनों में फायदेमंद है। पहली बात, वे अपने खाते का सत्यापन यथाशीघ्र कर पाएंगे। दूसरी, किसी भी विसंगति को टालने की गुंजाइश नहीं रहेगी। निगम की अपील है कि आवेदक लेजर प्रति प्राप्ति के समय उसमें दर्ज संपत्ति-विद्युत, जलकर, संपत्तिकर खाते और नामांतरण संबंधी विवरण को ध्यानपूर्वक जांचें। किसी भी त्रुटि पर तुरंत संबंधित कार्यालय में सम्पर्क कर सुधार करवा सकेगा।
व्यवस्था की यह समीक्षा दर्शाती है कि पारदर्शिता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि प्रक्रियाओं में उतार कर ही विश्वास बहाल किया जा सकता है। हमारी राय में, इस पहल से निगम के कामकाज में जवाबदेही बढ़ेगी और घोटाले की संभावनाएं कम होंगी। हालांकि, प्रक्रिया सफल तब ही होगी जब अधिकारियों के साथ-साथ आम लोग भी सतर्कता बरतें और दस्तावेजों की पड़ताल में सक्रिय भूमिका निभाएं।
निष्कर्षतः, इंदौर नगर निगम द्वारा नामांतरण में लेजर प्रति अनिवार्य करने की यह नई व्यवस्था एक सकारात्मक कदम है जो संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाएगी और घोटाले रोकने में सहायक होगी। अब समय है कि प्रशासन और जनता मिलकर भ्रष्टाचार मुक्त और विश्वसनीय नामांतरण प्रक्रिया सुनिश्चित करें।

