हिंदी दिवस के अवसर पर सिरमौर में सांस्कृतिक रंग दिखने को मिला जब नाहन के जिला स्तरीय कवि सम्मेलन ने श्रोताओं को पारंपरिक दास्तानों से हटकर आधुनिक कवियों की ताज़ा प्रस्तुतियाँ सुहागा दीं। इस बार की खास बात यह रही कि दादी मां की पुरानी कहानियों में उलझे बचपन को कविता के नए सुरों ने अपनी बाँहों में संभाला।
शंखनाद सामाजिक संस्था की ओर आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत में ही शिक्षाविद् और समाजसेवी अशरफ अली ने हिंदी भाषा की महत्ता पर प्रकाश डाला। उनके मुखर विचारों में भाषा के संरक्षण के साथ-साथ नवोदित रचनाकारों को मंच देने की भावना झलकती रही। उन्होंने बताया कि कैसे कविताएँ सिर्फ अलंकार नहीं बल्कि समाज की दर्पण भी होती हैं।
कार्यक्रम में स्थानीय कवियों ने अपनी भावपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत कीं। किसी ने ग्रामीण जीवन की सादगी गुनगुनाई, तो किसी ने युवा पीढ़ी की चिंताओं पर गहरी टिप्पणी की। मंच पर कवियों की जुगलबंदी ने हर उम्र के श्रोता को बाँधे रखा। खासतौर पर किशोर कवयित्रियों ने नई सोच और आधुनिक विषयों पर कविता प्रस्तुत कर सबका ध्यान खींचा।
मेरी दृष्टि से इस आयोजन ने सिरमौर में साहित्यिक चेतना को नया विस्तार दिया है। ऐसी कवि सभाएँ न सिर्फ भाषा की धरोहर संभालती हैं, बल्कि समाज के विविध अनुभवों को मंच पर सामने लाती हैं। जब दादी की कहानियाँ कविता बनकर जी उठें, तो भाषा की ताजगी और जनभावनाओं का मिलन और सार्थक हो जाता है।
अंततः हिंदी दिवस पर आयोजित इस कवि सम्मेलन ने संदेश दिया कि पुरानी यादों को बस सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें नए शब्दों व व्यंजना के साथ आगे बढ़ने दें। सिरमौर का यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि साहित्यिक मेल-जोल से ही हमारी सांस्कृतिक पहचान मज़बूत होती है और आने वाली पीढ़ियाँ भाषा से जुड़ी रहकर नए आयाम तय करती हैं।

