दीव के मलाला ऑडिटोरियम में रंगोत्सव की रंगीन शुरुआत: कला और शिक्षा का भव्य मेला

दीव के मलाला ऑडिटोरियम में रंगोत्सव की रंगीन शुरुआत: कला और शिक्षा का भव्य मेला

संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली और दमण-दीव के शिक्षा विभाग की ओर से संचालित समग्र शिक्षा दीव पहल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि छोटे प्रदेश भी बड़ी सांस्कृतिक पहल कर सकते हैं। 29 सितंबर को दीव के मलाला स्थित ऑडिटोरियम में जिला स्तरीय रंगोत्सव 2026-27 का दो दिवसीय आयोजन धूमधाम से शुरू हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय गीत के साथ हुई, जिसने मंच पर बैठे शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों के बीच एक गरिमापूर्ण माहौल तैयार कर दिया। ऐसे आयोजन दरअसल स्कूली शिक्षा को कक्षा तक सीमित रखने की सोच को चुनौती देते हैं और बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से बाहर निकालकर मंच तक ले आते हैं।

रंगोत्सव का विचार ही यह है कि कला, संगीत, नृत्य और रंगमंच बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का अभिन्न हिस्सा हैं, न कि कोई अतिरिक्त बोझ। दीव जैसे छोटे जिले में जहाँ संसाधनों की अपनी सीमाएँ हैं, वहाँ इतने व्यवस्थित ढंग से जिला स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन करना प्रशासनिक इच्छाशक्ति का प्रमाण है। मेरा मानना है कि इन प्रतियोगिताओं की असली कामयाबी इस बात में नहीं है कि कितने स्कूलों ने हिस्सा लिया, बल्कि इसमें है कि भाग लेने वाला हर बच्चा मंच से लौटकर आत्मविश्वास से भरा हुआ महसूस करे। मंच बच्चों म� भय, घबराहट और आत्मसंदेह को कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

दो दिन तक चलने वाले इस आयोजन में विभिन्न विद्यालयों के प्रतिभागी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे, और यही वह दौर है जब गाँव-कस्बे के छात्र बड़े मंच का अनुभव पाते हैं। बड़े शहरों के बच्चों के मुकाबले छोटे प्रदेशों के बच्चों को अक्सर अवसरों की कमी का सामना करना पड़ता है, और रंगोत्सव जैसे मंच इस अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभाते हैं। इनसे न केवल बाल कलाकारों का उत्साह बढ़ता है, बल्कि शिक्षकों को भी यह अवसर मिलता है कि वे अपने छात्रों की छिपी हुई प्रतिभा को पहचानें और उसे निखारें। कला यहाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षा का एक जीवंत हिस्सा बन जाती है।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि रंगोत्सव जैसे आयोजन शिक्षा विभाग और समग्र शिक्षा पहल के माध्यम से सरकारी विद्यालयों की छवि को बदलने में मदद करते हैं। जब परिवार देखते हैं कि उनके बच्चे केवल बोर्ड परीक्षा में नंबर नहीं, बल्कि अभिनय, गायन और प्रस्तुति में भी निखर रहे हैं, तो शिक्षा के प्रति उनका भरोसा गहरा होता है। हालाँकि चुनौती यह है कि ऐसे आयोजन नियमित और समावेशी बने रहें — हर बच्चे, खासकर बालिकाओं और विशेष जरूरतों वाले बच्चों को बराबरी का मौका मिले। अगर यह संतुलन बना रहा, तो रंगोत्सव सिर्फ एक सालाना कार्यक्रम नहीं, बल्कि दीव की सांस्कृतिक पहचान बन जाएगा।

दीव के मलाला ऑडिटोरियम में शुरू हुआ यह रंगोत्सव इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करता है कि जब शिक्षा कला से जुड़ जाती है, तो वह बच्चों के लिए आनंददायक और यादगार बन जाती है। दो दिवसीय इस आयोजन का शुभारंभ राष्ट्रीय गीत से करके संगीत, अनुशासन और देशभक्ति का जो संदेश दिया गया, वह आने वाले समय में बच्चों के भीतर मूल्यों और अभिव्यक्ति दोनों की नींव रखेगा। अंत में यही कहना उचित होगा कि ऐसे रंगीन मंच बच्चों के भविष्य को रोशन करते हैं और शिक्षा को एक सजीव, समावेशी एवं प्रेरणादायक अनुभव में बदलते हैं।

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